Friday, March 12, 2010

पहचान

 
                         पहचान 

                     सुबह से पूछते
                     शाम तक ढूंढते
                     रात को थक कर
                     सो जाते ...........

                    नहीं जान पते
                   अपनी पहचान

                   क्या करने आये है .?
                   क्या किया है ....   ?
                   क्या करके जायेंगे ?

                  कौन है हम
                  बताओ तुम......

                 सुबह से फिर दूंदने
                 शुरू हो जाते ....................
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20 comments:

प्रवीण शुक्ल (प्रार्थी) said...

सच में अर्चना जी हम सब जीवन की उथल पुथल में इतने मस्त है कि
बिना अपना वजूद जाने बस जिए ही तो जाते है
सादर
प्रवीण पथिक
९९७१९६९०८४

देवेश प्रताप said...

बेहतरीन रचना ......हम अपने पहचान के लिए सारी उम्र खुंद को धुन्ध्ते रहते है .

deepali said...

Very true it shows the real picture of our lives.....

अर्चना गंगवार said...

praveen ji......
devesh pratap ji.....
dear deepali......

aap sabhi ka abhut bahut sukrriya...shabdo ke madhyam se vyakt kiye gaye ahesaas ke saath aap kuch kadam saath chale.....

Mukesh Kumar Sinha said...

archana ji, bahut achchha...thori ashuddhiya hain...bas!!
kabhi hamare blog pe aaye
http://jindagikeerahen.blogspot.com

anju choudhary..(anu) said...

दिल को छू गया आपक लिखा अर्चना

आशीष/ ASHISH said...

Waise kuchh log mere jaise bhi hote hain, itna nahin sochte!
Rachna acchhi lagi!
Sochta hoon, thoda soch hi loon!
Hah hah....

अर्चना गंगवार said...

mukesh ji ....
aapka bahut bahut swagat hai....
achcha laga ...aapko kuch ashuddhi nazer aaii......ager aap ye baat batate ki ashuddhi kin shabdo mein hai tu aur achcha lagata.....

aage bhi aaye .....

अर्चना गंगवार said...

anu... mere shabdo ne aapke dil ko cho liya tu rachna ka janm sarthak ho jaya......aapke sabd ek nayi rachna ke beez bo gaye
...

dhanayawaad

अर्चना गंगवार said...

ashish ji ....

sach tu ye hai ki hum auro ke baare mein itna sochte hai ki kabhi khud ke bare mein sochne ka waqt hi nahi milta......

lakin jub hum nature ke paas baithte hai tu vo hamse kabhi bhi hamari pahechaan poch deti hai.....

tab hum apni pahechan janne ki kosis kerte hai.....

thanks for sharing

kumar zahid said...

नहीं जान पते

अपनी पहचान
क्या करने आये है .?
क्या किया है .... ?
क्या करके जायेंगे ?
कौन हम
कौन तुम......

kumar zahid said...

jagte hai to bas yahi sochte hai..sawal jag hain...

मनोज कुमार said...

अपनी अज्ञानता का अहसास होना ज्ञान की दिशा में एक बहुत बडा कदम है।
word verification हटा दीजिए ना। इससे टिप्पणी करने में असुविधा होती है।

राकेश कौशिक said...

इंसान खुद को पहचान ले वही सबसे बड़ी बात है - सार्थक रचना

अर्चना गंगवार said...

zahid ji, manoj ji, rakesh kaushik ji......aap sabne rachna per apne keemti shabd aur waqt diya bahut sukrriya.......

MUFLIS said...

मानवीय मनोविज्ञान
को दर्शाती हुई
कामयाब रचना

अर्चना गंगवार said...

muflis ji....

aapke shabd rachna ke liye kisi puraskaar se kam nahi.....

bahut sukrriya

Richa P Madhwani said...

अपनी अज्ञानता का अहसास होना ज्ञान की दिशा में एक बहुत बडा कदम है।
achhi line likhi hain

वीना said...

अपना लक्ष्य हम खुद नहीं जान पाते....
बढ़िया रचना.....
एक बात कहूं...जब आप टाइप कर लेती हैं तो चैक जरूर करिए क्योंकि टाइप करते वक्त कुछ गलतियां रह जाती हैं...
आपका ब्लाग अच्छा लगा...

Noopur said...

First time i steeped in here....nice post