Thursday, September 24, 2009

अस्तित्व

मैंने कई बार देखा है
दो इंटो के बीच se अंकुर फूट ते
मैंने कई बार देखा है दीवार पर पीपल को जमते......
जो बस यही कहता है.......
जहाँ ज़रा सी ,ज़रा सी मिटटी थी.......
जहाँ ज़रा सी , ज़रा सी धुप थी......
जहाँ ज़रा सा, ज़रा सा पानी था .......
हां एक अंकुर का अस्तित्व था
वहां मिटटी, धूप और पानी था

9 comments:

ललितमोहन त्रिवेदी said...

इस ज़रा ज़रा से में ही जीवन का अस्तित्व है अर्चना जी और हम ' सम्पूर्ण ' की तलाश में इसे खो देते हैं ! आपके इस सूक्ष्म अवलोकन और उसे काव्य में पिरो देने की क्षमता आपकी रचनाओं में प्रकट होती है ! अच्छा और सार्थक लिखती हैं आप !

अर्चना गंगवार said...

sukrriya lalit ji.....

achcha laga aapki pratikriya mili..

MUFLIS said...

poori srishti meiN hr kaheeN
astitva ki sambhaavnaaeiN moujood haiN....aur aapne hi to likha hai... "jo dhalaa nahi, wo banaa nahi.."
waah...km lafzoN meiN seedhi-saadhi aur gehri baateiN . . .
badhaaee.....
---MUFLIS---

अर्चना गंगवार said...

muflis ji ....

bahut sahi fermaya aapne ....
kan kan mein astitav maujud hai...

bus hamari nazro ko nazariya der se milta hai unhe pahechanne ka ...

sukrriya aapki khoobsorat pratikriya ka

Pramod Kumar Kush 'tanha' said...

bahut sunder rachna hai...badhayee sweekar karein...

deepali said...

Astitva is a nice kavita ...
In a nutshell it envolves a great thought...Everyone observe this around ourselves but it is u who created this in a nice thought of astitva....
Very nice.
Deepali

UNBEATABLE said...

Ankur sada Mitti, Dhoop aur paani pa kar hi astitva pa saktaa hai .... yeh sanketatmak rachnaa kitane utsah se bhari hai .... aapne bahut achha likha hai ...... Sundar aur utsahwardhak.

राकेश 'सोहम' said...

एक बहुत ही खूबसूरत अंदाज़ है ये बताने का कि अपने अस्तित्व के निर्माण के लिए थोड़ी सी, मात्र थोड़ी सी गुंजाइश ही काफी है . वरना बहाने तो बहुत हैं ... है न .

पहलीबार ही सही आपका ब्लॉग और अभिव्यक्ति भा गयी .

शुभ मंगलकामनाओं सहित अर्चना जी .

Archana Gangwar said...

Thanks rakesh soham ji